✍️ लेखक: L. Suresh Kumar
सावन का महीना चल रहा था। सुबह से ही आसमान में काले-काले बादल मंडरा रहे थे। हल्की फुहारें कभी रुकतीं, कभी चल पड़तीं। खेतों की हरियाली अपनी पूरी जवानी पर थी — बाजरा, मक्का, और हरा चारा लहलहा रहा था। माँ ने कहा,
“बेटा, भैंसों के लिए आज ताज़ा चारा ले आ। बारिश में हरा चारा नरम हो जाता है, जानवर शौक से खाते हैं।”
मैंने प्लास्टिक की चप्पलें डालीं, एक हसिया लिया, और सिर पर गमछा बांध लिया। पक्की सड़क से निकलते ही कच्चा रास्ता शुरू हो गया। बारिश की वजह से रास्ते में कीचड़ ही कीचड़ था। कहीं फिसलता, कहीं पैर धँसता। पर मन को तो जैसे एक अलग ही खुशी थी।
कच्चे रास्ते के दोनों ओर हरियाली थी — कहीं अरहर के फूल, कहीं मक्के की बालियाँ, और कहीं गेंहू की खाली पड़ी कटाई की ज़मीन। रास्ते में कुछ औरतें मिट्टी में अपने पाँव गाड़े खेत से लौट रही थीं — उनके सिर पर चारे की बड़ी-बड़ी गड्डियाँ और होठों पर सावन के गीत।
जब खेत पहुँचा, तो वहाँ की मिट्टी बिल्कुल गीली थी। पाँव जैसे मिट्टी में गढ़ जाते। लेकिन चारों तरफ फैला हरा चारा देखकर सारी थकान मिट गई। मैंने हसिया चलाना शुरू किया — पत्तियों की खुशबू, मिट्टी की सोंधी महक और बारिश की रिमझिम बूंदें, सब मिलकर मानो प्रकृति का संगीत बजा रहे थे।
चारा काटते-काटते कपड़े भीग गए, लेकिन मन भर आया — इतनी शांति, इतनी ठंडक, और प्रकृति के इतना करीब कभी शहर में तो न मिलती।
लौटते समय हाथ में चारे की गठरी थी, और चप्पलें हाथ में। कच्चे रास्ते में फिर से पैर फिसले, लेकिन अब मन में एक संतोष था — आज जानवरों के लिए ताज़ा चारा लाया हूँ, और खुद के लिए एक और सुनहरी याद।
“बारिश में भीगकर कच्चे रास्ते से खेत जाना — ये सिर्फ काम नहीं था, ये जीवन की एक साधना थी। मिट्टी की वो महक, पत्तों की वो नरमी, और उस चारे में बसी ममता — सब कुछ आज भी मन को हरियाली से भर देता है।”
☔ क्या आपने कभी बारिश में कच्चे रास्ते से खेत का सफर किया है? मिट्टी में फिसलते, चारा काटते, और वापस लौटते?
💬 हमें बताइए अपनी ऐसी ही कोई गाँव की बारिश भरी याद।
🧡 और पढ़ते रहिए “Meri Zindgi” ब्लॉग पर बचपन की वो भीगी यादें…

No comments:
Post a Comment